इन दिनों देश में स्वायत्ता की हवा तेज गति से आगे बढ़ रही है । फिर यह हवा चाहे नीरव मोदी वाले बैंक घोटाले को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारों को बढ़ाने के रूप में हो या सरकार के बंद पिंजरे का तोता कहे जाने वाली सीबीआई को सत्ता पक्ष की दखलंदाजी से मुक्त करने की बात हो । कर्नाटक चुनाव की तारीख आयोग की घोषणा से पुर्व ही लीक होने वाली स्तब्ध पुर्ण घटना हो या अलग राज्य की मांग । घटना के रूप भले ही अलग अलग दिखाई दे रहे हो लेकिन इन सबके पीछे कहीं ना कहीं मूल भावना स्वायत्तता की ही छिपी हुई है ।
स्वायत्ता का यह सिलसिला चुनाव आयोग और सीबीआई जैसी सैंविधानिक संस्थाओं या भारतीय रिजर्व बैंक जैसे नियामकों और अलग राज्यों की मांग तक सीमित नहीं है बल्कि अब यह सिलसिला शिक्षण संस्थानों तक पहुंच चुका है । गौरतलब है कि अभी हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय 62 उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता देने का निर्णय लिया है । इनमें प्रमुख शिक्षण संस्थानों को शामिल किया गया है । मसलन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय बीएचयू, एएमयू इत्यादि । इस निर्णय के अनुसार 5 केंद्रीय विश्वविद्यालयों , 21 राज्य विश्वविद्यालय 24 डीम्ड विश्वविद्यालय तथा दो निजी विश्वविद्यालय को अपने फैसले लेने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा ।
अमर उजाला - 5.04.2018
सरकार के इस तर्क में संदेह नहीं किया जा सकता कि इस फैसले से संस्थाओं की शैक्षिक गुणवत्ता का स्तर बढ़ेगा । विश्वस्तरीय पाठ्यक्रम और विश्वस्तरीय शिक्षक वाले पठन-पाठन के माहौल में शिक्षा के उत्पादन में गुणवत्ता आना स्वाभाविक है । लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हम एक समाजवादी लोक- कल्याणकारी राष्ट्र के निवासी हैं और एक लोक कल्याणकारी राष्ट्र का दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को शिक्षा स्वास्थ्य आदि बुनियादी सुविधाएं रियायती दरों पर उपलब्ध कराये । जब इन शिक्षण संस्थानों को सरकारी मदद कम या बंद हो जाएगी तो फीस का बढ़ना और गरीब तबके के आर्थिक सशक्तिकरण हेतु फेलोशिप , स्कॉलरशिप जैसी सामाजिक न्याय वाली योजनाएं का प्रभावित होना लाजमी है ।
यानी एक तरफ यह फैसला हमारे राष्ट्र के मूल चरित्र को ठेंगा दिखाता प्रतीत हो रहा है तो दुर्भाग्यवश हमारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती ' रोजगार विहीन शिक्षा ' की समस्या को दूर करने की ज्यादा उम्मीद नहीं बांधता दिखाई दे रहा । इसे देश की विडंबना नहीं तो और क्या है कहा जाए कि एक तरफ तो हम विश्व के सबसे युवा देश होने का गर्व महसूस करते हैं तो दूसरी ओर श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के आंकड़े इसके विपरीत तस्वीर प्रस्तुत करते दिखाई दे रहे हैं । आंकड़ों के मुताबिक देश की 65 फीसद आबादी नियमित रोजगार के अभाव से जूझ रही है | इससे भी चिंताजनक स्थिति तो यह है कि 60 फीसद ग्रेजुएट पोस्ट ग्रेजुएट कर चुके शिक्षित युवा शामिल है !
दरअसल अगर हम वास्तव में उच्च शिक्षा में सुधार चाहते हैं तो इसकी पहली शर्त है कि हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था जिन चुनौतियों से दो-चार हो रही है उन्हें पहचाने । चाहे वह चुनौती छात्र शिक्षक अनुपात के रूप में हो या कार्य संस्कृति के रूप में । इन सब पर संजीदगी से विचार करने की आवश्यकता है । जेएनयू जैसी संस्थाओं में जिस तरह कि स्तरहीन राजनीति देश को विचलित करती है , वह कम चिंता की बात नहीं है । छात्र शिक्षक अनुपात के बारे में बात करें तो अनेक शिक्षण संस्थाओं में 300 छात्रों पर एक प्राध्यापक वाला अनुपात विद्यमान है । जो किसी को भी अचरज में डाल सकता है । हमारे शिक्षण संस्थानों की प्रयोगशाला की जो स्थिति को उसे भी उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता ।ये न सिर्फ संसाधनों के अभाव से जूझ रही हैं बल्कि छात्रों को सत्र के अंत में उच्चतम अंक देने की मानसिकता भी बराबर विद्यमान है । ऐसी स्थिति में हमें शिक्षण संस्थानों के प्रशासन व प्राध्यापकों से नैतिकता की अपेक्षा है । साथ ही छात्रों को भी वर्तमान के टेक्नोलॉजी युग में शोध के महत्व को उजागर कर प्रेरित करना वर्तमान समय की निहायती जरूरत है ।
इन सब पहलुओं के बावजूद इसके उज्जवल पक्ष को नकारे तो यह बेमानी ही होगी | स्वायत्तता का यह फैसला न सिर्फ देश की नौकरशाही के कार्यों बोझ को कम करने वाला साबित होने वाला है बल्कि अनेक विश्वसनीय संस्थान जो भारत के शोध में निवेश करना चाहते हैं उनके लिए ये रास्ता आसान कर देगा । वर्तमान में देश में एक ' ब्रेन ड्रेन ' की परिपाटी सी बन चुकी है । यहां ' ब्रेन ड्रेन ' का अर्थ होनहार भारतीय छात्रों का विदेशों में बढ़ते आकर्षण से है । इस फैसले से न सिर्फ इस स्थिति में सुधार की संभावना है बल्कि , चुंकि देश में विदेशी संस्थाओं का आगमन होगा तो देश में ' रिवर्स ब्रेन ड्रेन ' की शुरुआत होगी जो भारत को नवाचार और शोध का केंद्र बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है ।
कुल मिलाकर विश्वस्तरीय शिक्षकों से पढ़ने का अवसर प्रदान करने वाला स्वायत्तता का यह कदम सराहनीय है बशर्ते हमारी हुकूमत द्वारा साफ मंशा से लिया गया फैसला निरकुंश स्वायत्तता की बजाय मात्र स्वायत्तता तक सीमित रहें । संस्थाएं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आड़ में शिक्षा का व्यापार न करने लग जाएं इसके लिए अति आवश्यक है कि संबंधित शिक्षण संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए । यह जवाबदेही न सिर्फ सरकार के प्रति बल्कि जनता के प्रति भी होनी चाहिए । इसके अतिरिक्त निश्चित समय अंतराल के बाद निष्पक्षता पूर्वक ऑडिटिंग की व्यवस्था भी बहुत जरूरी है ताकि संविधान निर्माताओं के लोक कल्याणकारी राज्य वाले सपने को कोई आंच ना आ सके ।
• लेखक - विनोद राठी
